व्यासप्रसादाच्छ्रुतवान् एतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात् साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ 18.75 ॥
भावार्थ: श्री व्यासजी की कृपा से मैंने इस परम गोपनीय योग को स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुख से साक्षात् अर्जुन के प्रति कहते हुए सुना।
विस्तृत व्याख्या: संजय अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। व्यासजी ने उन्हें दिव्य दृष्टि दी थी, जिसके कारण वे महल में बैठकर भी कुरुक्षेत्र के युद्ध और इस दिव्य संवाद को देख और सुन सके।