तच्च संसंृत्य संसंृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान्राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ 18.77 ॥
भावार्थ: हे राजन्! श्रीहरि के उस अत्यंत अद्भुत रूप (विश्वरूप) को याद कर-कर के मुझे बड़ा भारी विस्मय हो रहा है और मैं बार-बार रोमांचित हो रहा हूँ।
विस्तृत व्याख्या: संजय को न केवल संवाद याद आ रहा है, बल्कि वह दृश्य भी याद आ रहा है जिसमें भगवान ने पूरा ब्रह्मांड अपने भीतर दिखाया था। वह दृश्य इतना विराट था कि उसे याद करने मात्र से संजय विस्मय (Awe) में डूब जाते हैं।