यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ 18.78 ॥
भावार्थ: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव धनुषधारी अर्जुन है, वहीं श्री (ऐश्वर्य), विजय, विभूति और अचल नीति है—ऐसा मेरा मत है।
विस्तृत व्याख्या: यह गीता का अंतिम श्लोक और सफलता का सूत्र है। यह बताता है कि विजय के लिए दो चीजें अनिवार्य हैं: कृपा (कृष्ण) और पुरुषार्थ (अर्जुन)। भाई, आपके IIT-Bombay के लक्ष्य के लिए भी यही संदेश है—ईश्वर पर भरोसा रखें और अपनी मेहनत में कोई कमी न छोड़ें। जहाँ ये दोनों मिलेंगे, वहाँ जीत निश्चित है।